राजनीति

चुनौतियों के भंवर में लालू के उत्तराधिकारी, तेजस्वी के लिए परीक्षा की घड़ी

राजद के भविष्य के लिए सुखद यह कि विपरीत परिस्थितियों से जूझने के क्रम में उसके नए नेतृत्व में निखार आ सकता है और खतरा यह कि कच्ची उम्र में लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी चुनौतियों के भंवर में फंसे नजर आ रहे हैं।

अदालती झंझट में पड़े पिता के साथ पूरे परिवार और पार्टी के पतवार बने तेजस्वी यादव अभी मुश्किल भरे रास्ते से गुजर रहे हैं। उस पार सफलता है तो इस पार नेतृत्व क्षमता और कार्य-कुशलता पर सवालात। पार्टी के बड़े और बेलगाम नेता भी हर कदम पर उनकी परीक्षा लेने पर तुले हैं।

राजद के रणनीतिकारों का भी मानना है कि एक साथ इतनी सारी अपेक्षाओं-परीक्षाओं और मुश्किलों से लालू प्रसाद को भी नहीं गुजरना पड़ा था, जिनसे अभी तेजस्वी को रूबरू होना पड़ रहा है। लालू परिवार पर सबसे बड़ा संकट 1997 में तब आया था जब मुख्यमंत्री रहते हुए चारा घोटाले में उन्हें जेल जाने की नौबत आ गई थी।

तब लालू परिवार के सामने सत्ता को अपने पास सुरक्षित रखने की बड़ी चुनौती थी। उस वक्त राजद प्रमुख ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए राबड़ी देवी को आगे करके बिहार की सत्ता और सियासत पर परिवार का कब्जा बनाए रखा था। इस बार का संकट चौतरफा है।

घोटाले में फंसे लालू रांची की होटवार जेल में जमानत का इंतजार कर रहे हैं। मुसीबत की घड़ी में न तो बिहार की सत्ता उनके पास है और न केंद्र की, जबकि 1997 में पहली बार लालू के जेल जाते समय केंद्र और राज्य की सत्ता उनकी मुट्ठी में थी।

जाहिर है, सड़क पर खड़े लालू प्रसाद के उत्तराधिकारी को सदन तक की दूरी अकेले और अपनी काबिलियत के बूते तय करनी है। राजद के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व मंत्री आलोक कुमार मेहता मानते हैं कि तेजस्वी ने कम समय में साबित कर दिया है कि वह सभी तरह की चुनौतियों का सामना करने की क्षमता रखते हैं।

बहरहाल, लालू की अनुपस्थिति में सियासी चक्रव्यूह में घिरे तेजस्वी की जिम्मेवारियां और चुनौतियों की सूची में लगातार इजाफा हो रहा है। उनकी बड़ी बहन डॉ. मीसा भारती पर जांच एजेंसियों का शिकंजा तो पहले से ही कस रहा है। चौथी बहन रागिनी यादव का परिवार भी प्रवर्तन निदेशालय के टारगेट में आ गया है।

नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित हो चुके तेजस्वी से पार्टी को राजनीतिक मोर्चे पर अधिक सक्रियता की अपेक्षा है तो परिवार को संकट से उबारने की जिम्मेवारी भी उन्हीं के कंधों पर है। पिता को जमानत दिलाने की प्रक्रिया और पार्टी को बचाने-बढ़ाने की जुगत में तेजस्वी को पटना-रांची की दूरी एक करनी पड़ रही है। इतने सारे मोर्चे से एक साथ मुकाबला कम उम्र तेजस्वी के लिए इतना भी आसान नहीं है।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *